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रविवार, 29 नवंबर 2015

Sidhpur Fair

दोस्तो
मेला हमारे डि .एन. ऐ. में पुरातन काल से ही जैसे घुल गया है. मेला हंमेशा से ही दिलो को ओर संस्कृतीओ को मिलाने का सेतु बना है.सारे भारतवर्षमें कई लोकमेले हमारे लोकजीवनमें रंग भर रहे है.

         पघडी के फुमतेमें,मुछोके तावोमें,बिंदीयाकी चमक,जवानी की महक,उन्नत जोबनको कस कर संजोते हुइ चोलीकी कसोमें,खुश्बुदार बालोकी उडती लटोमें,कजराले नैनोकी नटखट अदाओंमे,गोरि गोरी कलांइयापे खनकते कंगनोमे,कमनीय कमरपे चमकते  हुए प्रस्वेद बुंदो मे,सब शर्म छोडकर घुमते हुए घम्मर घाघरोंमे,छम छम छमकते पायलोकी जनकारमे,....... न जाने कहां कहां बिखरा होता है ये मेला?

         कीचुड कीचुड करते हुए झुलो की जगाह आजकी जायन्ट  राइडस् ने भले ही ले ली हो पर हमारा  मेले प्रति आकर्षण तो वही है. संस्कृती को सजाता ये मेला व्यापारिक ओर वाणिज्यिक विकास का भी केन्द्र होता है. जब कोइ इन्टरनेट,मोबाइल या न्युजपेपरभी नहीं था तब से ये मेले प्रोडक्ट डिस्प्ले ,प्रमोशन ओर सेल का सेतु बने हुए है.
         भारतवर्षमें आयोजीत होते रहेते कई  मेलोमें से सिद्धपुरका कार्तिकी पूर्णिमा का मेला अपनी एक अलग ही पहचान रखता है.माना जाता हे की  कार्तिकी पूर्णिमा के दीन सिद्धपुरके मा सरस्वती के तट पर गंगा,यमुना ओर सरस्वती का अनोखा संगम होता है. कार्तिकी पूर्णिमा पर  तरपन के लीये सारे देश से लोग आते हे. सिद्धपुरमें  भगवान कार्तिकेय का मंदिर जो   कार्तिकी पूर्णिमाकी रात को दर्शनके लिये खुलता हे उसका लाभ भी श्रद्धालु लेते हे.

         कार्तिकी एकादशीके दिन से शुरु होता ये मेला कार्तिकी पूर्णिमा तक चलता है. श्रद्धालुओ के अलवा सारे देश से वेपारी भी अपनी अपनी चिजे बेचने आते हेै. यहां पर ऊंटो और अश्र्वो का बडा व्यापार  होता है.

    
 इसके अलावा सिद्धपुरके मेले में  रसीले गन्नोंका भी बडा व्यापार होता है, जो भी मेले मे आता है गन्ने खरीदे बीना नहीं रह पाता.

  ऊंटो और अश्र्वो  के शणगार का साजोसामान भी मेले का एक प्रमुख  आकर्षण है.
 दोस्तो  मेंने  आपको तस्वीरो के माध्यमसे मेले की सैर कराने की कोशिश की हे उम्मीद करता हुं की आपको पसंद आया होगा.

- दिप्तेश


        


शनिवार, 21 नवंबर 2015

Parent"s Blessing

दोस्तो
हर तस्विर कुछ ऐसा दिखाना ओर सिखाना चाहती है जो हम खुली आंखो से नहीं देख सकते मगर खुल्ले दिमाग से देख सकते है.



दोस्तो
इस तस्विर हमको क्या दिखाती ओर सिखाती हे? सोचो............
प्रथम द्रष्टी से तो ये एक गोंसला है , चिडिया का छोटा सा बच्चा इसमें पनाह लिये सिर्फ़ चोंच दिखाते हुए बैठा हे. लगता हे की अपने मा-बाप को पुकार रहा हे.
लेकिन अगर हम जरा सा गहन सोचे तो हमको क्या दिखाइ देता हे? मुजे तो इसमे  इसके मा-बाप का प्यार,दुलार,त्याग-बलिदान दिखाइ देता हे. कितने प्यार से ओेर कितनी ही मुसिबतो से लडते हुए उन्होने अपने बच्चे के लीये ए गोंसला तेैयार किया होगा? क्यों? कंयोा की मा-बाप अपने बच्चे को स्वस्थ ओर सुरक्षित रखाना चाहते हे.
क्या बच्चे बडे होकर इतनाही खयाल अपने मा-बाप का रखते हे? एसा भी हो सकता है की पंख निकल आने पर बच्चे मा-बाप को भुल कर अपनी दुनिया बनाने उड जाये, फिर भी मा-बाप कभी भी इस बात की परवाह नहिं करते.मा-बाप तो अपना प्यार,दुलार,मिलकत,.....,.....सब कुछ बच्चे पर लुटा देते हे.
दोस्तो इसी लीये मेने आगे बताया हे की हर तस्विर अपनी एक अलग ही कहानी संजोये हुए होती हे जो हम खुली आंखोसे नहीं देख सकते. इस तस्विरमे मा-बाप नहीं दिखते फिर भी ये तस्विर तो उनको ही दिखाती हे बस इसके लिये नजरिया चाहिये.
- दिप्तेश रावल